काव्य श्रृंखला – 69


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दुखीराम चाकू 🔪

बहुत थे दुखी कल दुखीराम भाई
प्रखर होने की भी सजा जिसने पाई

बहुत पूछने पर भी कुछ ना बताए
हड़ताल की जिद करे और जताए

बहुसूत्री मांगों का जत्था समेटे
दुखीराम का दुख पीएम हटाएं

करे कत्ल हत्यारा गर्दन उड़ाकर
दुखीराम की गर्दन पहले धराए

सहायक बहुत हैं भले ही किचन में
कटी उंगली पर दोष उनको लगाए

गिरा भाव मार्केट में कुछ इस कदर
अब गुंडे मवाली भी चाकू कहलाए

प्रखर रुप पहचान है उस गुणी का
मगर आज प्लास्टिक भी चाकू कहलाए

सभी के सहायक, दिखें संग डाकू
बहुत ही दुखी हैं, दुखीराम चाकू

© Arun अर्पण

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