प्रेम


प्रेम में होने से प्रेम को खोने तक।
प्रेम को जीने से प्रेम के लिए मरने तक।

प्रेम की उपलब्धता से प्रेम के चयन तक।
प्रेम की जागृति से प्रेम के शयन तक।

प्रेम के उद्भव से प्रेम के मरण तक।
प्रेम के आरंभ से प्रेम के अंतिम चरण तक।

प्रेम की अनूभूति से प्रेम के विस्मरण तक।
प्रेम के एकाधिकार से प्रेम के वितरण तक।

प्रेम के आर्विभाव से प्रेम के उत्थान तक।
प्रेम की स्थिरता से प्रेम के प्रस्थान तक।

प्रेम के दृश्य से प्रेम के चित्रण तक।
प्रेम के उद्धरण से प्रेम के सृजन तक।

प्रेम के निवेदन से प्रेम की विदाई तक।
प्रेम के भ्रम से प्रेम की सच्चाई तक।

प्रेम के स्पर्श से प्रेम के हाथ तक।
प्रेम के आलिंगन से प्रेम के साथ तक।

प्रेम के संदर्भ से प्रेम की बात तक।
प्रेम की ऊषा से प्रेम की रात तक।

प्रेम की भेंट से प्रेम के मिलन तक।
प्रेम की अवस्था से प्रेम के जीवन तक।

प्रेम के मिलन से प्रेम के बिछोह तक।
प्रेम के लगाव से प्रेम के मोह तक।

प्रेम के संदेश से प्रेम के पत्र तक।
प्रेम के दिवस से प्रेम के सत्र तक।

प्रेम की आतुरता से प्रेम के धैर्य तक।
प्रेम की मित्रता से प्रेम के वैर्य तक।

प्रेम की आसक्ति से प्रेम की शक्ति तक।
प्रेम की अव्यक्तता से प्रेम की अभिव्यक्ति तक।

प्रेम के छंद से प्रेम के राग तक।
प्रेम की ईर्ष्या से प्रेम के अनुराग तक।

प्रेम के संदेह से प्रेम के विश्वास तक।
प्रेम की तृष्णा से प्रेम की आस तक।

प्रेम के स्थायित्व से प्रेम के अंतरण तक।
प्रेम की हंसी से प्रेम के विदारण तक।

प्रेम की चंचलता से प्रेम की गंभीरता तक।
प्रेम की विद्या से प्रेम की विद्यमता तक।

प्रेम के शिष्टाचार से प्रेम के आचरण तक।
प्रेम की गहराई से प्रेम के आवरण तक।

प्रेम की प्रतिष्ठा से प्रेम के सम्मान तक।
प्रेम के गर्व से प्रेम के अभिमान तक।

प्रेम के उल्लास से प्रेम के उत्सव तक।
प्रेम की सम्पन्नता से प्रेम के वैभव तक।

प्रेम के छल से प्रेम के समर्पण तक।
प्रेम के अर्पण से प्रेम के तर्पण तक।

प्रेम के योग से प्रेम के जोग तक।
प्रेम के रोग से प्रेम के भोग तक।

प्रेम की पुस्तक से प्रेम के पुराण तक।
प्रेम की गीता से प्रेम की कुरान तक।

प्रेम के स्नेह से प्रेम के वात्सल्य तक।
प्रेम के सदन से प्रेम के देवालय तक।

प्रेम के बंधन से प्रेम की मुक्तता तक।
प्रेम की पूर्णता से प्रेम की रिक्तता तक।

प्रेम के प्रत्येक रूप में प्रेम की हर यात्रा में,
केवल प्रेम अपना अस्तित्व ही खोता है।

प्रेम की खोज सदा अपूर्ण ही रहा करती है,
क्योंकि प्रेम तो सबके भीतर ही होता है।

प्रेम ब्रह्मांड सा विशाल प्रेम बोधिसत्व सा
प्रेम पंचतत्व सा मनुष्य में षष्ठ तत्व ही होता है।

प्रेम को नहीं चाहिए कोई भी विशेषण,
क्योंकि प्रेम तो केवल प्रेम ही होता है।

रचना : अल्हड़ सी लड़की

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