मैं धारणा नहीं तुम्हें सच दिखा रही हूं।


यकीन…।

मै धारणा नही ,
तुम्हे सच दिखा रही हूँ ।
जो तुम हो ,
उससे अवगत तुम्हे-
करा रही हूँ ।

मै बन जाऊ आगर हमसफर तुम्हारी ,
तो क्या तुम निभा भी लोगे ,
ये रिश्ता जो जोड़ रहे हो,
उसे अंतिम सांस तक चला भी लोगे ।

बातें तो करते हो बड़ी बड़ी ,
पर सच का महल सजा भी लोगे ,
नन्हे से एक मकान को ,
घर तुम बना भी लोगे ।

जिन खुशियों की बात कर रहे ,
क्या वाकई तुम पा भी लोगे ।
मुझसे नाता जोड़ कर ,
क्या जिन्दगी बिता भी लोगे ।

अगर कर लू मै यकीन ,
तुम्हारी सारी बातों का ,
क्या भरोसा कि –
“नही छोड़ोगे हाथ
जन्मों जन्मों के साथों का “।

तुम फिर कभी-
दगा नही दोगे ,
कैसे करु यकीन-
“की तुम मुझे ये
सज़ा नही दोगे “।

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