भीगी शाम की भीगी यादें


भीगी भीगी शाम की इक प्यारी सी झिलमिल सी याद आकर मुझसे टकरा गई,
वो नाजुक सी कोमल गुलाब की पंखुड़ियों को हाथ में लिए देर तक मैं उसे देखे जा रही थी,
हल्की हल्की बारिश में वो मेरे हाथों में भींग रहा था,
और खुद में सिमटता जा रहा था,
जैसे मैंने छुईमुई के पौधे को छू लिया हो,
वो हल्की गुलाबी रंग की पत्तियां जिसपर बूंदों ने मानो कब्जा कर लिया हो,
ऐसा लग रहा था की मानो वो तंज में मुस्कुरा रही हो और कह रही हो कि चंद लम्हों की बरसात मेरी किस्मत नहीं बदल सकती,
क्योंकि मैं पौधे से टूट चुकी हूं और बागों से अलग हो चुकी हूं,
किसी की मेहरबानी ने मुझे कुछ पल के लिए जिंदा कर दिया,
मुझे बूंदों में भिगा कर थोड़ी देर के लिए ताजगी दे दी लेकिन फिर मेरा क्या होगा??
जैसे ये बारिश खत्म होगी मैं कहां जाऊंगी??
मुझे तो फिर मुरझाना ही है किसी के हाथों में,
मेरी ताजगी दो पल में झुलस जायेगी मेरी कोमल पत्तियां टूट कर बिखर जायेंगी,
मेरा अस्तित्व हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा,
वो एहसास मेरे दिल में घर कर गया वो लम्हा मेरे सीने में कैद हो गया,
वो हल्की हल्की बारिश वो भीगा भीगा सा शाम और हाथों में हजारों ख्वाहिशों को दिल में दफन करके आखरी खुशी को महसूस करता हुआ एक प्यारा सा गुलाब,
जो अंदर से आंसू में भीग रहा है तो बाहर बूंदे भिगा रहीं है,
एक पल के लिए मुझे यूं लगा मैं गुलाब की पंखुड़ियो
की तरह बिखरी पड़ी हूं किसी की हाथों की लकीरों के ऊपर,
लेकिन मैं उसकी हाथों की लकीर नहीं हूं वो मुझपर बूंद बूंद की तरह गिरता तो है..लेकिन सिर्फ जिस्म को छूकर फिसल जाता है रुह तक कभी पहुंच ही नहीं पाता,
और फिर ये सोच कर दिल परेशान हो उठता है की जब बारिश खत्म हो जाएगी ये आखरी बूंद का कतरा
भी मुझे छूकर फिसल जाएगा,
फिर क्या होगा इस कोमल जिस्म का..ये भी वक्त के
साथ मुरझा कर एक दिन हमेशा के लिए किसी कूड़े की ढेर में पड़ा पड़ा मर जायेगा,
फिर से बारिश होगी..फिर कोई नई कली बारिश की बूंदों में यूं ही भीगेगी..और मुस्कुरा कर यही शिकायत करेगी….

तोड़ लेना इस गुल को,गुलिस्तां में अब नए फूल खिलने वाले हैं…..
और नहला देना मुझे बूंदों में दुबारा ये मौका नहीं मिलने वाला है…..

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