महादेव


हमारे आराध्य कैलाश पर्वत पर बैठे वो “धुरजटी”….तुमसे उन्मोचना का परिणाम आधी रातों की सुगबुगाहट है
जैसे कोई अलक्षित यात्री में तड़पन होती है…..धूप में तरुवर के वटवृक्ष की…
मुझे भी मदनमहीने की नवल रतिरूप सी तड़पन हैं…
कि मैं मधुमस्त हो जाऊं नंदनवन की सेज पे….
तेरे संग अपने उर को तेरे उर से स्तब्ध कर….चित्ताकर्षक से कोसों दूर नगण्य वासनाओं से परे…..पिक की आवाजो में दहकती रूहानी प्रेम की अग्न दहर-दहर करती अंतरात्मा की तृष्णा
और इन वार्तालाप के मध्य
“न कुकुर भुके, ना पहरू जागे”
बिरला वरहणी की प्रेमी मिलन की भेंट की व्याकुलता को विसर्जित कर देना
समिधा के रूप में हवन कुंड में….
शतदल पे उड़ता भवरा कितना क्रतिवान है…कि कमल को अपना पाथेय समझ कर सम्यक होता है उसकी सुगंध में
सारी अंतर्निरुध्दताओ तो गह्वरता में गाड़ के अंदरूनी विचारों से व्द्न्दातीत होकर मैं तुम्हारे स्नेह की मदिरा में मदोध्दत हो जाऊं वासना रूपी धूप से विजितातपा रूपी छाव में।हम दोनों आत्मा के प्रेम कि ओर अग्रसर होंगे।

उन्मोचन = मुक्त करना
सुगबुगाहट= जागरण
आंतरिक व्याकुलता अथवा धीमी आवाज
अलक्षित= अज्ञात
मदनमहीने =वसंत
रतिरूप= कामदेव की पत्नी
मधुमस्त = प्रेम रूपी पुष्पों का रस पीकर मस्त
नंदनवन= इंद्र का उद्यान
नगण्य = तुच्छ
पिक = कोयल
समिधा= हवन कुंड की सामग्री
अंतर्निरुध्दताओ =भीतरी रुकावट
गह्वरता= गहराई
व्द्न्दातीत =द्वंद के परे
मदोध्दत =प्रेम का नशा या गर्व में चूर
विजीतातपा = वासनात्मक धूप को दूर करने वाली छाव।

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