कभी आओ तो फुर्सत के कुछ पल साथ लाओ….


कैसे कहूं तुमसे…. और क्या -क्या कहूं… कभी सुनने की फुरसत लाते हो अपने साथ.. फुरसत तो बहुत हैं तुम्हारे पास मुझे सुनने की.. बस सुनने की समझने की नही
तुमसे क्या अनकहा रहा है मेरी जिंदगी में और तुमने कितना अनसुना रखा है.. यह तो तुम्हे ही पता होगा
और फिर भी कह भी दू तो क्या गुंजाइश है की तुम समझोगे भी उस बात को.. समझ के भी क्या समझोगे और कितना समझोगे.. जितना मैं तुम्हे बताना चाहती हूं उतना या जितना तुम समझना चाहते हो उतना.. कही हुई बाते भी तो तुम समझते नही.. खामोश मन की गहराई को कैसे समझोगे.. अपने जहन में कितनी बाते समेट रखी है मैने कभी उनको सुनने का वक्त भी हैं क्या?
सवालों का सैलाब सा है मेरे भीतर.. कब मिलेंगे उनके जवाब.. जवाब हैं भी या नही.. और है तो तुम बताते क्यों नहीं या तुम बताना चाहते नही… आखिर कुछ तो कहो कब तक भ्रम में जीती रहूं.. अब हकीकत से वाकिफ कर भी दो.. यह प्यार है या स्वार्थ जो तुम कर रहे हो.. भ्रम में रख कर मेरे जज्बातों की कद्र कर रहे हो या इस भ्रम को तोड़ कर साथ रहने का स्वार्थ साध रहे हों…
किस बात का इंतजार है यह या सिर्फ इंतजार तक ही प्यार है।
अपने आप में उलझ चुकी हूं अब सुलझा भी दो .. सुलझा नही सकते या सुलझाना नहीं चाहते.. क्या तुम्हे मोह ने बांध लिया है?
किस बात का मोह हैं तुम्हे? उन सपनों का जो कभी पूरे नहीं हो सकते या उस आस का जो कभी तुम्हे मुझसे मिला देगी?
कैसी आस? वो जो हकीकत से परे है.. जिसका कोई वजूद ही नही वो आस… माना तुम अनकही बाते नही समझते लेकिन कही हुई कब समझते हो.. मेरा तो सोचो.. मांगी हुई खुशियां कब किसी को भाती हैं मगर शायद यह ही तकदीर है
तरसती है मेरी निगाहें की कभी तो तुम उनकी बातो को पढ़ोगे इंतजार के सिवा कुछ नहीं है मेरे पास… अब बस इंतजार से जंग है देखते हैं पहले कौन खत्म होता हैं…

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