लड़की हूं


लड़की हूँ
घरवाले,बाहरवाले भी,अपने पराए सबने कहा।

बचपन से ही इनमें भेद किया जाता है
गुड़ियाँ से खेलो,गुड्डो से नहीं खेला जाता हैं

तुम लड़की हो,थोड़े में काम चला लो
ये माखन रहने दो,सुखी रोटी ही खा लो

ये बर्तन धो लो,ये कपड़े सूखा दो
एक काम करो,थोड़ा झाड़ू लगा दो

रोती हूँ कभी कभी लेकिन,हर काम करती हूँ,
सबकी बातें सुनती,लेकिन लड़की होने से डरती हूँ।
क्योंकी मैं एक “लड़की” हूँ।

तुम्हे बाहर क्यों जाना,तुम्हे घर मे ही रहना है,
बड़े होकर रसोई का काम ही करना है,

इतनी बड़ी हो गयी,अकेले पढ़ने कैसे जाओगी,
किसी ने कुछ कहा तो,फिर क्या मुँह दिखाओगी,

छोड़ दो अब कॉलेज़ जाना,अब कितना पढ़ोगी,
शादी के बाद आख़िर घर का काम ही करोगी,

छोड़ दिया अब पढ़ना,अब घर मे रहती हूँ
मान ली मैंने सबकी बात,क्योंकि माँ-बाप की इज्जत करती हूं,
क्योंकि मैं एक “बेटी” हूँ।

शादी के बाद लड़की को क्या ख़ुशी मिलती हैं,
सिर्फ आँसू, और ज़िल्लत भरी जिंदगी मिलती है,

तुम नयी दुल्हन हो,सर से आँचल गिराना मत,
पुरानी रीत है यहाँ, नये ख्यालात मन मे लाना मत,

ये ससुराल है,ज्यादा देर यहाँ सोना मत
मुस्कुरा कर हर काम करो,यहाँ कभी रोना मत,

हर रोज़ खुद से,एक झूठा वादा करती हूँ
करती हूँ खुद से सवाल,और खुद ही में उलझती हूँ,
क्योंकि अब मैं एक “बहू” हूँ।

ये कैसे समान टूटा,ये कैसे ग्लास गिरायी,
क्यों करती हो नुक़सान, क्या अपने बाप के घर से है लायी,

कहते है लोग की हम बहू को बेटी का दर्ज़ा देंगे,
नहीं करेंगे अत्याचार,हर सम्मान देंगे,

फिर क्यों हर दिन तानों की एक जाल बुनी जाती है
कितना भी वो चिल्लाये, पर एक ना सुनी जाती है।

जीती हूँ हर रोज़ तो,हर रोज़ मरती हूँ
किससे करूँ शिकायत सिर्फ ज़ुल्म ही सहती हूँ,
क्योंकि अब मैं एक “बहू” हूँ।

कुछ दिन बाद जब वो “माँ”बन जाती हैं
फिर भी उसके नसीब में कहा ख़ुशी आती हैं,

बच्चों पर वो अपना जान लुटा देती हैं
सब होता पति का,अपनी पहचान मिटा देती है,

बच्चें अब बड़े होकर कहाँ किसी की सुनते है
नये ख़यालात के बच्चें है,हवाओं में उड़ते है,

फिर भी अपनी आँसू पोछ ख़ुशी ज़ाहिर करती हूँ,
नहीं डरती किसी से,किस्मत से सिर्फ डरती हूँ।
क्योंकि अब मैं एक “माँ” हूँ।

कहती है भले ही सारी दुनियां, औरत मर्द से कम नहीं
लेकिन फिर दिखा देती,मर्द तो मर्द है,मर्द जैसे हम नही,

कभी कभी ख्यालों के बादल आकर लिपट जाती है,
इस कहानी में औरत की सारी जिंदगानी सिमट जाती है,

फिर भी किसी से शिकायत नही,जिंदगी से अब लड़ती हूँ,
हिम्मत तो कमज़ोर नही,पर दुनिया से डरती हूँ,
क्योंकी मैं एक “औरत” हूँ।

कोरा बचपन ,कोरी जवानी,कोरी मेरी जिंदगानी है
कोरे कागज़ पर लिखी औरत की ये कहानी है….

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