पीना सीखिए


पीना सीखिए,
जीवन के विष को पीना सीखिए…

हर भाव को समांगी बनाके मन में घोल लीजिए,
घोल को शरबत सा मान पीना सीखिए..

शिव सिर्फ वही है जिसने विष को पिया,
उस देवों के देव को अर्पण करना सीखिए…

जो मथा गया सागर से वो अमृत था और विष भी था,
अमृत को छोड़ विष को अपने में पीना सीखिए…

बहुत कड़वाहट मिली है जिंदगी के पानी में,
पानी को मीठा सा मान पीना सीखिए…

अटकन झटकन लटकन सिसकन,
या रह रह के ज्वार सा उठने वाली तडपन,,
हर दर्द को डुबो दीजिए मन की अथाह गहराइयों में,
मथिये मन को,सागर सा होना सीखिए…

पीना सीखिए,
हर दर्द को अपनी में पीना सीखिए…

हर गुजरता दिन कालकूट विष सा तजुर्बा देता है,
इस विष में समभाव से घुलना सीखिए…

एक भाव से मन में उतरना सीखिए,
दरिया में थोड़ी गहराई लाना सीखिए,,
खट्टा मीठा जैसा भी तजुर्बा हर दिन देती है जिंदगी,
हर तजुर्बे को मन के दरिया में डुबोना सीखिए…

उबलना बंद कीजिए किसी पानी के माफिक,
अपने किरदार में संजीदगी पिरोना सीखिए,,
जितनी गहरी विपदा उतना शांत मन,
मन में मनसिज के बीज बोना सीखिए…

जो युद्ध में स्थिर है वही युधिष्ठिर है,
थोड़ा थोड़ा खुद में स्थिरता लाना सीखिए,,
क्रोध और प्रेम एक मन के बदलते भाव हैं,
मन को स्थिर बनाके जड़ता लाना सीखिए…

पीना सीखिए,
जीवन के विष को पीना सीखिए…!!

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