मां की गुड़िया बनना था कांच की गुड़िया बन गई मैं….

मां की गुड़िया बनना था कांच की गुड़िया बन गई मैं...ना गले लगाया किसी ने अबतक पर रोते सबने देखा हैनफ़रत देखी आंखों में जिसने भी अब तक देखा हैएक…

ये लड़कियां न जाने कितना दर्द सहती हैं……

ना जाने ये लड़कियां कितना दर्द सहती हैंमां की लाडली अब मां बिन अकेली ससुराल में रहती हैंसास के ताने सुन देवर की फटकार पर ये कुछ ना कहती हैंना…

मैं आधुनिक युग की शायद न लगूँ, क्योंकि मुझे पसंद है माथे पर बिंदी और बोली में हिंदी, मुझे मेरे पोशाक से गंवार न समझना।मैं गाँव से हूँ 22वीं सदी भी जानती हूँ, लेकिन मैं गाँव से हूँ।ये मेरे लिए सम्मान होगा कम से कम मेरे जरिये ही सही तुम गाँव को देखोगे।दिखावा, आधुनिकता झूठे आडम्बर से भरे लोगों के बीच तुम मुझे 18वीं सदी का ही समझना…..