श्रृंगार रस

विकट कालिमा घनघोर रात्रि की निहित है उसके केशो में,वक्र भृकुटी उसकी भुजा सी अद्वितीय है कोटिं विशेषों में।ललाट है सूर्य सा तेजमयी पलकें अमूल्य आभूषण हैं,खंजन नयनों की मदिरा…

रात के आंचल में दिन के कई अफसाने लिखती हूं

रात के आँचल में दिन के कई अफसाने लिखती अपनी खामोशी के लफ्ज़ों में ही पूरी बातें रखती हूँ!तसव्वुर क्या सजाऊँ मै नींदों को आखों मे भरकर, अपने ख्वाब-ओ-ख्याल टूटने…