काव्य श्रृंखला – 71

ग्रामीण शिक्षा की बदहाल स्थिति ड्रेस, बूट, कॉपी, बुक, टीचर भी मुफ्त मगरसरकारी स्कूलों से क्यों जनता बिदकाय रहीभरे हैं महीने भर की कमाई फीस में परकॉन्वेंट नाम पर क्यों…

काव्य श्रृंखला – 66

बर्बाद गुलशन मर चुकी मानवता में क्यों जान देखते हो तुमझूठ और फरेबों में क्यों ईमान देखते हो तुममतलबी यारानों में क्यों यार देखते हो तुमटूटते घरानों में क्यों प्यार…

काव्य श्रृंखला – 64

इंसान बनाम कुत्ता तब इंसान पालता था कुत्ताअब इंसान पालता है, कुत्ताबाइक सवार देखा एक दिनपट्टा था एक व सवारी तीनथा मजेदार कुछ अलबत्ताविस्मित अर्पण हक्का बक्कादोनों के गले एक…

काव्य श्रृंखला – 62

मानव बनाम चप्पल टूटी चप्पल, हुई विचलित नारचुपचाप खड़ी मोची के द्वारपतले प्लास्टिक में बंधी चप्पलना थी खुलने की जिद पर यार निष्ठुर मोची था धुन में मगनललना को नजर…