काव्य श्रृंखला – 66

बर्बाद गुलशन मर चुकी मानवता में क्यों जान देखते हो तुमझूठ और फरेबों में क्यों ईमान देखते हो तुममतलबी यारानों में क्यों यार देखते हो तुमटूटते घरानों में क्यों प्यार…

काव्य श्रृंखला – 64

इंसान बनाम कुत्ता तब इंसान पालता था कुत्ताअब इंसान पालता है, कुत्ताबाइक सवार देखा एक दिनपट्टा था एक व सवारी तीनथा मजेदार कुछ अलबत्ताविस्मित अर्पण हक्का बक्कादोनों के गले एक…

काव्य श्रृंखला – 63

खुशियों की राखी बातों नातों में सरस मधुमयखटके क्यों युति उसकी चपलाएक नार सृजित सर्जित सकलाकर्तव्य सृजन फिर क्यों अबला पय सुधा पिला बनी मातृ मधुरसमरस समोदर भगिनी सबलाजब धार…