काव्य श्रृंखला – 66

बर्बाद गुलशन मर चुकी मानवता में क्यों जान देखते हो तुमझूठ और फरेबों में क्यों ईमान देखते हो तुममतलबी यारानों में क्यों यार देखते हो तुमटूटते घरानों में क्यों प्यार…